विकास या सोशल इंजीनियरिंग?

dr sidharth

गाजीपुर। आगामी लोकसभा को देखते हुए प्रत्येक मतदाता के ज़ेहन में कुछ ज़मीनी सवाल उमड़ रहे है। आख़िर क्या कारण है की विकास होने के वावजूद विकास चुनाव का मुद्दा नहीं बन पा रहा है? क्या प्रियंका गांधी का राजनीति में आना राहुल गांधी का राजनीतिक असफलता दर्शाता है? क्या प्रियंका गांधी की नेतृत्व क्षमता मोदीशाह के नेतृत्व क्षमता को लोकतांत्रिक चुनौती दे पाएगा? प्रियंका गांधी के राजनीति में आने से मूलतः नुक़सान किसका और लाभ किसका होगा?

लोकसभा चुनाव जैसे जैसे नज़दीक आ रहा है वैसे वैसे राजनीतिक सियासतदानो ने सियासत में बने रहने के लिए अपनी अपनी राजनीतिक एवं रणनीतिक चाले चलनी शुरू कर दी है। कुछ सियासती चाले ऐसी भी चली गई जहाँ वैचारिक विचारधारा को छोड़कर एक मंच पर आना पड़ा, क्योंकि राजनीतिक पहचान खोने का भय जिसका एकमात्र वैकल्पिक समाधान जो सामने निकलकर आया वो है सोशल इंजीयनरिंग। सोशल इंजीयनरिंग जिसका आधार धर्म, वर्ग, जाति, क्षेत्र स्थानीय मुद्दे एवं प्रत्यक्ष लाभ। जैसा की तमाम राजनीतिक विश्लेषणकर्ता कहते आए है सोशल इंजीयनरिंग ही लोकतन्त्र की रीढ़ है जिसका विकल्प बिकास ना ही कभी था ना रहेगा।

वर्तमान मोदी सरकार तमाम नेक्स्ट जेनरेशन इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के वावजूद विकास को राजनीतिक मुद्दा बना पाने में असमर्थ रही है, क्योंकि देश की सामाजिक संरचना को विकास के साथ साथ भागीदारी की कमी दशकों से महसूस की जा रही है। विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ना कही ना कही वर्तमान केन्द्र सरकार के लिए जीत का फ़ार्मूला नहीं साबीत होगा और सरकार इस बात से बख़ूबी वाक़िफ़ है।। हालाँकि केन्द्र सरकार की योजनाओं का अगर ईमानदारी से समीक्षा करे तो ज़्यादातर योजनाए सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ो वंचितो के लिए लाभकारी साबीत हुई है। जैसा की आँकड़े बताते है लगभग 22 करोड़ परिवारों को किसी ना किसी केंद्रिय योजना का लभारथी है अर्थात हर चौथा या पाँचवा परीवार केंद्रीय योजना का लभारथी है।

विकास के परे अगर नज़र डालते है तो हम पायेंगे की मोदी सरकार के कुछ क्रमवार दृढ़ निश्चय भी लिए जो राष्ट्रीय एवं अंतरष्ट्रिय स्तर पर कुशल नेतृत्व के लिए मील का पत्थर साबीत हूवा।।चाहे वो नोटबंदी हो या, आर्थिक आधार आरक्षण या फीर एस॰सी॰/एस॰टी॰ एक्ट या फिर देश की सुरक्षा से जुड़ी सर्जिकल स्ट्राइक्स। कुछ क़दम ऐसे भी रहे जो राजनीतिक मुद्दे भी बने और सरकार की किरकिरी भी हुई वो चाहे 13 पॉंट्स रोस्टर हो या फिर शैक्षिक संस्थानो के साख को राजनीति के कारण धूमील करना, देश छोड़कर भागे भागोडे कारोबारियों को देश में वापस ना ला पाना, 2014 के मेनफ़ेस्टो में किए गए तमाम वादों को पूरा ना कर पाना भी कही ना कही सरकार के लिए आगामी चुनाव में अड़चनें पैदा करने वाला है। अगर पूरे कार्यकाल को देखा जाए तो वर्तमान केंद्र सरकार के पास कुशल नेतृत्व, नेतृत्व क्षमता है जो विपक्ष के पास नहीं है। परन्तु क्या नेतृत्व होना ही काफ़ी है?, जहाँ आज़ादी के दशकों बाद आज भी राजनीतिक मुद्दे स्वास्थ्य, सड़क, शिक्षा, ग़रीबी उन्मूलन, सामाजिक समरसता की असमानतावो को दूर नहीं कर पायी है।

विकास को ना लेकर अगर वर्तमान सरकार पिछले लोकसभा में हिन्दुत्व/ राम मंदिर, रोजगार एवं सांस्कृतिक भारत पर चुनाव लड़ी थी जो आज भी यथावत है तो फिर क्या बदला है बीते पाँच साल में जिसे लेकर वर्तमान सरकार चुनाव मैदान में आएगी? अगर दूसरे पहलूवो पर नज़र डाले तो महागठबन्धन एवं गठबंधन में सीट बँटवारों को चल रहे बड़ी एवं छोटी क्षेत्रीय पार्टियों में बहुत से बदलाव आगामी दो महीने में और देखने को मिलेंगे जैसा की बिहार, पूर्वोतर राज्यों एवं तिलांगना में हुआ।

वही अगर प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाले राज्य, विपक्ष के नेता राहुल गांधी एवं हाल में हुए महागठबन्धन पूर्वमुख्यमन्त्री अखिलेश यादव एवं मायावती वाले 80 लोकसभा सीट वाले प्रदेश उत्तरप्रदेश के मिज़ाज बात करे तो आकलन अभी जल्दबाज़ी होगी।। लेकिन सपा बसपा गठबंधन एवं उनके बोटप्रतिशत के सोशल एंजियनरिंग ने राजनीतिक चाणक्य के माथे पर सीकन तो डाल दीया है।। इसी कड़ी में सपा से रूष्ट होकर स्वयं की पार्टी बनाने वाले शिवपाल यादव ने थोड़ी राहत प्रदान की है। क्योंकि चाचा शिवपाल यादव के लिए भी पूर्वांचल एक अग्निपरीक्षा का केन्द्र होगा जहाँ इनके द्वारा की गई घेराबन्दी की सोशल इंजीनियरिंग की मज़बूती भाजपा की राह आसान तो गठबन्धन की मुश्किलें भी बढ़ायेगी।। राजा भयिया की पार्टी जनसत्ता से बहुत फ़र्क़ पड़ता नहीं दीख रहा है क्योंकि प्रदेश सूबे के मुखिया योगी आदित्य नाथ क्षत्रीय बोट को जोड़कर रखने में सफल हुए है।। सम्प्रदाय की वर्ग की या यू कहे अल्पसंख्यक समुदाय की राजनीति करने वाले साम्प्रदायिक जनप्रतिनिधियो की मुश्किलें भी बढ़ी है। क्योंकि प्रियंका गांधी का लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनना एवं पूर्वांचल का प्रभारी बनना कितना राजनीतिक रणनीतिक साबीत होगा देखना दिलचस्प रहेगा जहाँ कई बड़े नेता अपना क़िस्मत आज़माते है।

पूर्वांचल में प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी, समाजवाद के स्तम्भ नेताजी मुलायम सिंह, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर महेन्द्र नाथ पाण्डेय, केन्द्र में दो बड़े मंत्रालयों में मन्त्री मनोज सिन्हा, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री एवं उपमुख्यमंत्री की सीट गोरखपुर एवं फूलपुर, केन्द्र में स्वास्थ्य मन्त्री अनुप्रिया पटेल, केन्द्र में भाजपा के अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद सोनकर, ये कुछ ऐसे नाम है जो पूर्वांचल में अपनी क़िस्मत आज़माते रहे है या रहेंगे। पूर्वांचल का विकास होने के वावज़ूद विकास मुद्दा नहीं बन पा रहा है, जहाँ का चुनाव सोशल इंजीनरिंग, रोज़गार एवं हिन्दुत्व होगा।
कांग्रेस मूलत राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता पर हो रहे विपक्षियों के प्रहार से प्रियंका गांधी कितना बचा पाएगी, क्योंकि प्रियंका गांधी का नेतृत्व क्षमता किसी से छिपा नहीं है चाहे वो 1999 का लोकसभा चुनावी दौरा हो या 20 वर्ष पश्चात 2019 में दो बड़े प्रदेश मध्यप्रदेश एवं राजस्थान के नेतृत्व को लेकर उपजे विवाद को सुलझाना। इसलिए अगर गांधी परीवार के राहुल गांधी अगर नेतृत्व क्षमता में पिछड़ भी जाते है तो प्रियंका गांधी अपने नेतृत्व क्षमता से कांग्रेस की नैया पार करने का भरसक प्रयास करेंगी।। प्रियंका गांधी के एक्टिव राजनीति में आने का क़यास लगाया जाता रहा हैं जो बीते सप्ताह पटाक्षेप हो गया पर क्या कांग्रेस जो कुशल नेतृत्व की कमी की भरपाई प्रियंका गांधी के रूप में हो पाएगी जिसपर विपक्ष हमेशा से हमलावर रहा है।

प्रियंका गांधी के पूर्वांचल आने से नुक़सान किसका होगा और किसका फ़ायदा ये तो भविष्य की गोद में है। लेकिन सोशल इंजीयनरिंग की माने तो देश भर में मज़बूती से लड़ रही क्षेत्रीय दलो के मत प्रतिशत में नुक़सान सर्वाधिक होगा जिसकी प्रतिशत लगभग 7-15% तक हो सकता है। अगर कांग्रेस वर्ग एवं जाति की राजनीति करने वाले दलो से गर गठबंधन करती है प्रदेशो में तो सर्वाधिक नुक़सान फीर भाजपा का हो सकता है। इस लोकसभा में हर बार की तरह एक एक बोट मायने रखेंगे और जीत हार का प्रतिशत भी बहुत क़रीबी होने वाला है। उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार है जो लेखक से जुड़े राजनीतिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक विचारधारा से कोई सरोकार नहीं है।

डॉक्टर सिद्धार्थ सोनकर
प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर
फ़्लोरिडा इंटेरनेशनल यूनिवर्सिटी
फ़्लोरिडा अमेरीका

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